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सामान्य अनुकूलन सिंड्रोम

सामान्य अनुकूलन सिंड्रोम, जिसे स्ट्रेस सिंड्रोम भी कहा जाता है, मनुष्यों और पशुओं के शरीर में होने वाली अनुकूलन प्रतिक्रियाओं का एक समूह है। ये प्रतिक्रियाएं बहुत तीव्र और लंबे समय तक रहने वाले हानिकारक प्रभावों के जवाब में उत्पन्न होती हैं, जिन्हें आक्रामक कारक कहा जाता है। संकेतों और प्रतिक्रियाओं के इस समूह का वर्णन हांस सेल्ये (Hans Selye) ने 1936 में किया था और बाद में यह स्ट्रेस के नाम से जाना गया।

स्ट्रेस पैदा करने वाले आक्रामक कारकों में शारीरिक, मनोवैज्ञानिक, जैविक और सामाजिक प्रभाव सहित कई अलग-अलग कारण हो सकते हैं। इनमें शारीरिक थकान, मनोवैज्ञानिक दबाव, संक्रमण, चोट, पर्यावरण में बदलाव और कई अन्य घटनाएं शामिल हो सकती हैं।

सामान्य अनुकूलन सिंड्रोम आम तौर पर कई चरणों में प्रकट होता है:

  1. चेतावनी चरण (उत्तेजना): शरीर “लड़ो या भागो” प्रणाली को सक्रिय करके स्ट्रेस पैदा करने वाले कारकों पर प्रतिक्रिया देना शुरू करता है। इस दौरान एड्रेनालिन और नॉरएड्रेनालिन जैसे स्ट्रेस हार्मोन निकलते हैं।

  2. प्रतिरोध चरण: यदि स्ट्रेस पैदा करने वाले कारक बने रहते हैं, तो शरीर उनके अनुसार खुद को ढालने और उनसे निपटने की कोशिश करता है। इससे एक स्थिर चरण आ सकता है, जिसमें शरीर स्ट्रेस से जूझता रहता है।

  3. थकावट चरण: यदि स्ट्रेस पैदा करने वाले कारक बहुत तीव्र हों या लंबे समय तक बने रहें, तो शरीर के अनुकूलन संसाधन समाप्त हो सकते हैं। इस चरण में विभिन्न बीमारियां और विकार उत्पन्न हो सकते हैं।

सामान्य अनुकूलन सिंड्रोम स्ट्रेस के प्रति शरीर की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है और कुछ स्थितियों में जीवित रहने में सहायक हो सकता है। हालांकि, यदि स्ट्रेस पैदा करने वाले कारक बहुत तीव्र हों या लंबे समय तक बने रहें, तो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं।