साहचर्यवाद, साहचर्यवादी मनोविज्ञान
साहचर्यवाद और साहचर्यवादी मनोविज्ञान ऐसी मनोवैज्ञानिक अवधारणाएं हैं जिनमें मानसिक घटनाओं और चेतना की कार्यप्रणाली को समझाने के लिए साहचर्य की प्रक्रियाओं को प्रमुख भूमिका दी गई थी। ये अवधारणाएं 19वीं सदी और 20वीं सदी के आरंभ में लोकप्रिय थीं और इनमें कई धाराएं शामिल थीं:
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अंग्रेजी दर्शन में साहचर्यवाद: यह पहलू जॉन लॉक और डेविड ह्यूम जैसे दार्शनिकों से जुड़ा है, जिन्होंने इस बारे में विचार विकसित किए कि हम धारणाओं और प्रत्यक्ष अनुभवों के बीच साहचर्य के माध्यम से ज्ञान कैसे प्राप्त करते हैं।
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जर्मनी में साहचर्यवादी मनोविज्ञान: साहचर्यवादी मनोविज्ञान विल्हेम वुंट और उनके विचार-संप्रदाय जैसे शोधकर्ताओं से जुड़ा था। उनका मानना था कि चेतना के तत्वों के बीच साहचर्य का अध्ययन करके मानसिक प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया जा सकता है।
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मनोचिकित्सा में साहचर्यवाद: मनोचिकित्सा के क्षेत्र में साहचर्यवाद मानसिक विकारों तथा विचारों और लक्षणों के बीच साहचर्यात्मक संबंधों के अध्ययन से जुड़ा है।
कुल मिलाकर, साहचर्यवाद और साहचर्यवादी मनोविज्ञान ने मानसिक प्रक्रियाओं में विचारों, प्रत्यक्ष अनुभवों और धारणाओं के बीच साहचर्य और संबंधों की भूमिका पर बल दिया। हालांकि, मानव मन की जटिलता को समझने के इनके सरलीकृत और यांत्रिक दृष्टिकोण के कारण इन अवधारणाओं की आलोचना भी हुई।