साहचर्य संवेदनाओं, मानसिक छवियों, विचारों, भावनाओं और अन्य मानसिक अवस्थाओं जैसी चेतना की अलग-अलग विषय-वस्तुओं के बीच बनने वाला एक नियमित संबंध है। ये संबंध समानता, विरोध, समय और स्थान की निकटता तथा कारण और परिणाम के संबंध जैसे विभिन्न सिद्धांतों के आधार पर बन सकते हैं। साहचर्य हमारी चेतना को बनाने और व्यवस्थित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और अलग-अलग विचारों एवं धारणाओं को आपस में जोड़ने में हमारी मदद करते हैं।

यह ध्यान रखना चाहिए कि मनोविज्ञान में साहचर्य की अवधारणा का समृद्ध इतिहास है और कई प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन किया है। उदाहरण के लिए, जॉन लॉक और डेविड ह्यूम ने साहचर्य को ज्ञान प्राप्त करने और धारणाएं बनाने की एक प्रमुख प्रक्रिया माना था। उनका मानना था कि हमारी धारणाएं हमारे प्रत्यक्ष अनुभवों और जीवन-अनुभवों के बीच बनने वाले साहचर्यों के आधार पर बनती हैं।

साहचर्य का अध्ययन साहचर्यवादी मनोविज्ञान के अंतर्गत भी किया गया था, विशेषकर विलियम जेम्स और जॉन स्टुअर्ट मिल के कार्यों में। इन शोधकर्ताओं का मानना था कि साहचर्य चेतना के काम करने की मूल प्रक्रिया है और इसे विभिन्न सिद्धांतों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

आधुनिक मनोविज्ञान में साहचर्य की अवधारणा अब भी महत्वपूर्ण है, लेकिन इसे अक्सर सीखने, स्मृति और निर्णय लेने जैसी अधिक जटिल संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं के संदर्भ में देखा जाता है।