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मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र

मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र (डिफेन्स मेकैनिज्म) ऐसी रणनीतियां और तरीके हैं, जिनका उपयोग मन व्यक्ति के भीतर या बाहरी परिस्थितियों से पैदा होने वाले टकरावों से जुड़े चिंताजनक और अप्रिय अनुभवों को कम करने या छिपाने के लिए करता है। रक्षा तंत्रों में जानकारी को अलग-अलग तरीकों से बदलना और समझना शामिल हो सकता है, ताकि वह व्यक्ति के मानसिक संतुलन के लिए अधिक स्वीकार्य और कम डरावनी लगे।

मुख्य मनोवैज्ञानिक रक्षा तंत्र:

  1. दमन: इस तंत्र में अस्वीकार्य विचारों, भावनाओं या यादों को जानबूझकर या अनजाने में सचेत ध्यान से अलग कर दिया जाता है। व्यक्ति किसी अप्रिय बात के बारे में न सोचने की कोशिश कर सकता है।

  2. प्रक्षेपण: इस तंत्र का उपयोग करते समय व्यक्ति अपने नकारात्मक गुणों या इच्छाओं को दूसरे लोगों में देखता है, ताकि उसे अपने भीतर उनकी मौजूदगी स्वीकार न करनी पड़े। उदाहरण के लिए, आक्रामक रुझान वाला व्यक्ति दूसरों पर आक्रामक होने का आरोप लगा सकता है।

  3. तर्कसंगतीकरण: इस तंत्र में व्यक्ति अपने कामों या अनुभवों के लिए तर्कसंगत स्पष्टीकरण देता है, ताकि उनके वास्तविक कारणों को छिपाया जा सके, जो अक्सर अधिक जटिल और भावनात्मक होते हैं।

  4. प्रतिगमन: तनाव या चिंता का सामना होने पर व्यक्ति इस तंत्र का सहारा लेकर सोचने या व्यवहार करने के ऐसे कम विकसित तरीकों की ओर लौट जाता है, जो बच्चों में पाए जाने वाले तरीकों जैसे होते हैं।

  5. बौद्धिकीकरण: इसमें व्यक्ति अपनी भावनाओं को सचेत विचार से अलग करके स्थिति के बौद्धिक पहलुओं पर ध्यान देता है। इससे तीव्र भावनाओं का अनुभव करने से बचा जा सकता है।

  6. उदात्तीकरण: इस तंत्र में नकारात्मक या अस्वीकार्य इच्छाओं को सामाजिक रूप से स्वीकार्य गतिविधियों में बदला जाता है। उदाहरण के लिए, आक्रामकता महसूस करने वाला व्यक्ति खिलाड़ी बन सकता है।

  7. पृथक्करण: इस तंत्र का उपयोग करते समय व्यक्ति भावनाओं को उनसे जुड़ी घटनाओं या विचारों से अलग कर देता है, ताकि उनसे संबंधित चिंता कम हो सके।

व्यक्ति तनाव और टकराव के अलग-अलग रूपों से निपटने के लिए अनजाने में इन रक्षा तंत्रों का उपयोग कर सकता है।