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मनोवैज्ञानिक आकलन

मनोवैज्ञानिक आकलन में किसी व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं, प्रक्रियाओं और अवस्थाओं का मूल्यांकन और मापन किया जाता है। मनोवैज्ञानिक आकलन के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:

  1. अध्ययन के विषय: मनोवैज्ञानिक आकलन में बुद्धि, व्यक्तित्व के गुण, भावनात्मक स्थिति, प्रेरणाएं, योग्यताएं और कौशल, साथ ही मानसिक विकार और मनोविकृतियां जैसी कई मनोवैज्ञानिक विशेषताएं शामिल हो सकती हैं।

  2. विधियां और साधन: मनोवैज्ञानिक आकलन में मानकीकृत टेस्ट, प्रश्नावलियां, अवलोकन, क्लिनिकल इंटरव्यू, शारीरिक मापन और कई अन्य विधियों तथा साधनों का उपयोग किया जाता है।

  3. विश्वसनीयता और वैधता: मनोवैज्ञानिक आकलन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों में विश्वसनीयता (बार-बार मापने पर परिणामों की सटीकता और एकरूपता) और वैधता (किसी साधन की उस चीज को वास्तव में मापने की क्षमता, जिसे मापने के लिए उसे बनाया गया है) शामिल हैं।

  4. मानकीकरण: मनोवैज्ञानिक आकलन के परिणामों की दूसरे लोगों के आंकड़ों से तुलना करने के लिए मानकीकरण किया जाता है, यानी लोगों के एक बड़े समूह से आंकड़े एकत्र किए जाते हैं, ताकि कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताओं के मानदंड या औसत मान तय किए जा सकें।

  5. नैतिकता: नैतिक सिद्धांतों का पालन मनोवैज्ञानिक आकलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें परिणामों की गोपनीयता सुनिश्चित करना, आकलन के लिए रोगी की सहमति लेना और पेशेवर मानकों के अनुसार परिणामों का सही उपयोग करना शामिल है।

  6. उपयोग: मनोवैज्ञानिक आकलन का उपयोग क्लिनिकल मनोविज्ञान (मानसिक विकारों का आकलन), शिक्षा (शैक्षिक उपलब्धि के स्तर का निर्धारण), व्यवसाय (भर्ती और कर्मचारियों का मूल्यांकन), खेल (खेल कौशल का आकलन) और अन्य क्षेत्रों में किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक आकलन लोगों की मनोवैज्ञानिक विशेषताओं और जरूरतों को समझने में मदद करता है। इस तरह यह मानव गतिविधि के विभिन्न क्षेत्रों में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालता है और जीवन की गुणवत्ता तथा कार्यक्षमता को बेहतर बनाता है।